प्रस्तुत कविता २६/११ के हमले में शहीद हुए वीर योद्धाओं को मेरी एक श्रद्धांजलि है ...
गगन और समुद्र में नहीं कोई मिलाप है
आज देखो शब्द में नहीं कोई विलाप है
स्वयं के ही शोक में प्रफुल्लित समाज है
महाविनाश के लिए खड़ा हुआ विकास है
दस आतंकियों के समक्ष खड़े हुए है वीर दक्ष
वीरगति को प्राप्त कर गौरवित हो जायेंगे वक्ष
मिटा सके जो हमें , आज देखना वो कौन है
स्वयंप्रभा के समक्ष देवता भी मौन है
मौन को अशक्तता समझने की ये भूल है
पथ विरक्त करने को आज कांपता भी शूल है
आज देखो रक्त में फिर वही उबाल है
मातृभूमि के लिए खड़ा हुआ हर लाल है
मातृभूमि के लिए खड़ा हुआ हर लाल है...