कल रात एक मच्छर को नशा हो गया
मैंने पूछा भाईसाहब कहाँ है आपको जाना
वो बोले मुझे नहीं कहीं है जाना
बस खून पीना और यहीं पर है गुनगुनाना
मैंने कहा क्या बीवी नहीं होंगी परेशान
उनका भी ध्यान रखा करें बलवान
वो बोले
वो भी यहीं कहीं पी के पड़ी होगी टुन्न
तू मेरा गान सुन नहीं तो कर दूंगा कान तेरा सुन्न
सुबह होते ही मुझे है निकलना
और रात में ये शेरो शायरी भी है पूरी करना
मै घबराई, कुछ सकुचाई, कुछ शरमाई
और फिर देकर राम की दुहाई, हिम्मत से बोली
मुझे तो लग रही है सर्दी इसलिए
मुझे तो लग रही है सर्दी इसलिए
मै तो चादर ओढ़ के सो जाऊँगी जल्दी
क्यूँ नहीं तुम दिन में गुनगुनाते
महफिल में बैठ के सबको नहीं सुनाते
वो बोले
सबको नहीं है इस कला की क़द्र
इसलिए आप ही बनो हमारे हमदर्द
तब तक माँ मुझे दे गयीं एक चिक्की
और बोलीं जला लो बेटा इसे जल्दी
वरना आँख खुल जायेगी जल्दी
मै भी गयी थी बहुत थक
और यह देख कर उन भाईसाहब का मुंह पड़ गया फुक्क
मैंने भी झुर्र से लगाई दियासलाई से उसमें आग
और वो भाईसाहब फुर्र से गए वहां से भाग ...