Sunday, November 1, 2009

एक मच्छर से वार्तालाप

कल रात एक मच्छर को नशा हो गया

मैंने पूछा भाईसाहब कहाँ है आपको जाना

वो बोले मुझे नहीं कहीं है जाना

बस खून पीना और यहीं पर है गुनगुनाना

मैंने कहा क्या बीवी नहीं होंगी परेशान

उनका भी ध्यान रखा करें बलवान

वो बोले

वो भी यहीं कहीं पी के पड़ी होगी टुन्न

तू मेरा गान सुन नहीं तो कर दूंगा कान तेरा सुन्न


सुबह होते ही मुझे है निकलना

और रात में ये शेरो शायरी भी है पूरी करना

मै घबराई, कुछ सकुचाई, कुछ शरमाई

और फिर देकर राम की दुहाई, हिम्मत से बोली
मुझे तो लग रही है सर्दी इसलिए

मै तो चादर ओढ़ के सो जाऊँगी जल्दी

क्यूँ नहीं तुम दिन में गुनगुनाते

महफिल में बैठ के सबको नहीं सुनाते

वो बोले

सबको नहीं है इस कला की क़द्र

इसलिए आप ही बनो हमारे हमदर्द

तब तक माँ मुझे दे गयीं एक चिक्की

और बोलीं जला लो बेटा इसे जल्दी

वरना आँख खुल जायेगी जल्दी

मै भी गयी थी बहुत थक

और यह देख कर उन भाईसाहब का मुंह पड़ गया फुक्क


मैंने भी झुर्र से लगाई दियासलाई से उसमें आग

और वो भाईसाहब फुर्र से गए वहां से भाग ...